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कर्तव्य, कर्म और करुणा के प्रतीक : जितेंद्र सिंह पटेल


पारसमणि अग्रवाल 


प्रशासन के गलियारों में अक्सर एक शोर होता है आदेशों का, नियमों का, और कभी-कभी बेबसी का। लेकिन कोंच की तहसील में जब आप प्रवेश करते हैं, तो वहां एक अलग ही अहसास होता है। वहाँ की हवाओं में एक ऐसा धैर्य और सादगी है, जिसके पीछे का नाम है जितेन्द्र सिंह पटेल।
अक्सर लोग पद मिलते ही जमीन से ऊपर उठ जाते हैं, लेकिन जितेन्द्र जी उन विरले लोगों में से हैं जिन्होंने कुर्सी पर बैठकर भी अपने पैर जमीन पर मजबूती से टिकाए रखे हैं। जब कोई व्यक्ति अपनी ज़मीन का विवाद, अपनी पीढ़ियों का दर्द या अपनी आख़िरी उम्मीद लेकर उनके सामने खड़ा होता है, तो वे केवल एक तहसीलदार की तरह नहीं, बल्कि एक सहयोगी की तरह व्यवहार करते हैं। उनकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि वे फरियादी की बात को सिर्फ सुनते नहीं उसे महसूस करते हैं। उनके चेहरे की वह शांत मुस्कान उस डरे हुए व्यक्ति के लिए आधा न्याय तो वैसे ही हो जाता है।
प्रशासन में अक्सर टारगेट और डेडलाइन का दबाव होता है। मैंने उनके सानिध्य में कार्य करते हुए यह नज़दीक से देखा है कि वे कैसे इस बोझ को अपने ऊपर लेकर अपने स्टॉफ को इससे बचाते हैं। वे जानते हैं कि एक खुशहाल टीम ही एक सफल प्रशासन की नींव है। अगर टीम का कोई साथी कहीं अटकता है, तो वे ऊपर से आदेश देने वाले बॉस की भूमिका में नहीं आते, बल्कि एक बड़े भाई की तरह उसके साथ बैठ जाते हैं। वे साथ मिलकर काम करते हैं, उलझनों को सुलझाते हैं और सिखाते हैं। उनके साथ काम करते हुए काम का लोड कम और सीखने का अवसर ज्यादा महसूस होता है। उनका व्यवहार ऐसा है कि स्टॉफ का हर सदस्य उन्हें अपना मार्गदर्शक मानता है। उनके मार्गदर्शन में काम करना दबाव नहीं, बल्कि एक गर्व का विषय बन जाता है।
वे जानते हैं कि कानून की किताबें क्या कहती हैं, लेकिन वे यह भी बखूबी जानते हैं कि कानून का असली उद्देश्य क्या है? इंसान की भलाई। उनके फैसलों में कठोरता कम और मानवीयता ज्यादा होती है। जो व्यक्ति खुद संघर्षों की भट्टी से तपकर निकला हो, वह दूसरों की पीड़ा की तपिश को बेहतर समझ सकता है। जितेन्द्र जी के निर्णयों में अक्सर वही सहानुभूति झलकती है। वे कानून की सीमाओं में रहकर भी न्याय का रास्ता ढूंढ निकालते हैं।
आज के दौर में जब समाज का सिस्टम से भरोसा डगमगाता है, तब जितेन्द्र सिंह पटेल जैसे लोग उस भरोसे को फिर से ज़िंदा कर देते हैं। वे साबित करते हैं कि यदि नीयत साफ हो, तो प्रशासन का सबसे छोटा पद भी लोगों की जिंदगी में सबसे बड़ा बदलाव ला सकता है। उनकी पहचान उनके पद से नहीं, बल्कि उस सुकून से है जो उनके कक्ष से बाहर निकलने वाला हर व्यक्ति अपने साथ ले जाता है।
 कर्तव्य को साधना बनाना और करुणा को अपनी ताकत रखना यही उनके व्यक्तित्व का सार है।
जितेन्द्र सिंह पटेल केवल एक नाम नहीं हैं, बल्कि वे उस प्रशासन का एक उम्मीद भरा चेहरा हैं जिस पर हर गरीब और लाचार व्यक्ति आँख मूँदकर भरोसा कर सकता है। वे शासन के एक ऐसे प्रतिनिधि हैं जो अपनी कलम की स्याही से कागजों पर नहीं बल्कि लोगों के दिलों पर अपनी छाप छोड़ते हैं।

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