Wednesday, 7 August 2019

विदेश में फंसे भारतीयों को सुरक्षित भारत लौटा अलविदा हुई सुषमा



 पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज आज  दुनिया को अलविदा कह गई भाजपा की वरिष्ठ नेता सुषमा स्वराज का जन्म 14 फरवरी 1952 में अंबाला में हुआ था राजनीति में आने से पहले सुषमा सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता के पद पर काम करते हैं साल 2014 में भारतीय जनता पार्टी के द्वारा सत्ता पर काबिज होने के बाद सुषमा स्वराज को विदेश मंत्री का पद सौंपा गया था इस पद की जिम्मेदारियों को बखूबी निभाते हुए उन्होंने विदेश में फंसे कई भारतीयों की सकुशल वतन वापसी कराई है ।

जब कभी भी वतन से बाहर रह रहे किसी भारतीयों को सहायता की जरूरत पड़ी सुषमा स्वराज ने हर मुमकिन कोशिश को अंजाम दिया यमन में जब हाउती विद्रोही और सरकार के बीच जंग छिड़ी थी तो हजारों भारतीय  इस जंग के बीच में फस गए थे जंग लगातार बढ़ती जा रही थी और सऊदी अरब की सेना लगातार यमन में बम  गिरा रही थी इन्हीं हालातों के बीच यमन में फंसे भारतीयों ने जब विदेश मंत्री से गुहार लगाई तो  विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने यमन से भारतीयों को बचाने के लिए ऑपरेशन राहत चलाया और ऑपरेशन के दौरान साढे पाँच हजार से ज्यादा लोगों को सुरक्षित बचाया

इस ऑपरेशन के तहत ना सिर्फ भारतीयों को बचाया गया बल्कि यमन में फंसे 41 देशों के नागरिकों को भी सुरक्षित किया गया इसमें से  4640 भारतीय थे

सिर्फ इतना ही नहीं दक्षिण सूडान में   सिविल बार में  फसे भारतीयों को सकुशल वापस लाने के लिए विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने ऑपरेशन संकट मोचन की शुरुआत की इस ऑपरेशन के तहत डेढ़ सौ से ज्यादा भारतीयों को बाहर निकाला गया इसमें लगभग आधा सैकड़ा लो केरल के शामिल थे इसी तरह लीबिया में सरकार और विद्रोहियों के बीच छिड़ी जंग में कई भारतीय भी  चिंगारियां के शिकार हो रहे थे लीबिया से भारतीयों को सुरक्षित वापस लाने की तैयारी तेज की गई और 29 भारतीयों को सुरक्षित भारत लाया गया।

पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के प्रयासों का ही परिणाम है  की 15 साल पहले भटक कर सीमा पार पाकिस्तान पहुंच गई 8 साल की मासूम गीता को भारत लाया जा सका गीता जब अपने वतन अपनी माटी लौटी तब उसकी उम्र 23 साल हो चुकी थी गीता भारत आने के बाद सबसे पहले विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से ही मिली थी।

बतातें चलें कि वर्ष 2009 में सुषमा स्वराज भाजपा द्वारा संसद में विपक्ष की नेता चुनी गयी थीं, जिससे वह भारत की पन्द्रहवीं लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष रही हैं। इसके पहले भी वे केन्द्रीय मन्त्रिमण्डल में रह चुकी हैं तथा दिल्ली की मुख्यमन्त्री भी रही हैं। 2009 के लोकसभा चुनावों के लिये भाजपा के चुनाव-प्रचार-समिति की अध्यक्ष भी रहीं थीं। 67 साल की आयु में 6 अगस्त, 2019 की उनका दिल्ली में निधन हो गया।

Friday, 3 May 2019

सीनियर तो है मगर....................




जब नए शिक्षण संस्थान में दाखिला लेने के बाद नए माहौल में नए टीचर के साथ-साथ नए सीनियर भी मिलते है तो सीनियर कैसे होगें? ये सवाल जहन में ठीक उसी प्रकार कौंधता है जिस प्रकार आसमान में बिजली। और मैं तो जब शिक्षा के लिए पलायन कर शहर की हवाओं से रूबरू हुआ तब तक तो जूनियरटी सीनियरटी का मतलब ही नहीं जानता था क्योंकि ऐसा माहौल मुझे स्नातक तक नहीं मिला बस इतना जानता था कि हां,रैगिंग नाम की भी कोई चीज होती है। नए शहर के नए परिवेश में सुनी रैंगिग की कहानियां जहॉ मन में अजीब सा डर पैदा कर रही थी तो वहीं एक ओर इसको गहराई से जानने के लिए उत्सुकता भी। लेकिन मेरे साथ जो हुआ मेरे सीनियर ने जो किया उसे सुनकर तो आप ये ही कहेगें कि क्या ऐसे होते है सीनियर?

परास्नातक के पड़ाव को पार कर आगे बढ़ने के लिए और सिर्फ यादों को लिए कुछ लोगों से बिछुड़ने के लिए अब 29 दिन बचे हुए है। चूकिं एक लेखक के रूप में पहचान मिली है तो बस इस श्रृखंला के माध्यम से छोटा सा प्रयास है अपने सीनियरों को धन्यवाद कहने का हालांकि उनके स्नेह भरे अत्याचारों के लिए शुक्रिया शब्द बहुत छोटा है होगा आज इसी श्रृखंला में हम बात करते है निधि पाल मैम की।

यथा नाम तथा गुण की कहावत को सत्य रूप प्रदान करती निधि मैम सर्पोट करने के साथ-साथ खुश एवं खुले मिजाज की है। किसी भी लड़की को देखे तो उसकी नफरतों की सूची में मोटापा टॉप में होगा। मोटी न होने के बाद भी मोटी मैम, मोटी मैम कहने के बाद भी गुस्सा दिलाने के लाख प्रयास नाकाम हो जाते है बस ज्यादा गुस्से में यही सुनने को मिलता भक्क पागल....इसी बात से अंदाजा लगाया जा सकता है मैम के स्वभाव का। हालांकि सीनियरों में यदि किसी ने सबसे ज्यादा मजा लिया तो वो आप ही है चाहे एक दूसरे सीनियर के साथ घटने वाला चाय काण्ड हो या फिर और भी कोई। लेकिन एक खास बात यह भी है कि जिन मुद्दों पर बात करने से लोग कतराते है उन मुद्दो ंपर भी जरूरत पड़ने पर आपके साथ सवाल जवाब करने को मिला।

घड़ी की टिक-टिक करती सुई ने कब एक साल पूरा कर दिया पता ही नहीं चला लेकिन वो लम्हें वो यादें आज भी है चाहे वो आपके जन्मदिन पर खाने का ऑर्डर कर उन्हें न खाने का हो या फिर क्लास रूम से बैठाकर टिफिन खिलाने का। चाहे पर वो घर पर बुलाकर पथरी का पैकेट दिखाने का हो या फिर जागरण फेस्टिवल में जाने का। चाहे वो दूसरी मैम से लड़ने के बाद सुलह कराने का हो या फिर अपनी रचनाओं पर जबरदस्ती वाह वाह बुलाने का। चाहे वो मूर्खतापूर्ण सवाल पूछने का हो या फिर परेशान करने का।  हर जगह आपका साथ व स्नेह मिला। 

आगामी 15 को आप अपने कैरियर के एक नए पड़ाव को प्रारम्भ करने जा रही। आत्मीय शुभकामनाओं के साथ बस यूं ही कहना चाहूंगा कि यूं ही हमेशा साथ बने रहना। चिढ़ाने पर बुरा न मानना ....मान भी जाओ तो क्या मना लेगें। नए शहर में नए माहौल में नए लोगो के बीच अपनेपन का अहसास करा न सिर्फ एक सीनियर बल्कि एक अभिभावक की भूमिका निभाने के लिए दिल से साधुवाद

Thursday, 2 May 2019

जरूरी नहीं हर सीनियर रैगिंग लेता हो, कुछ सोचने पर भी मजबूर करते.......




स्वाभाविक सी बात है कि सीनियर का नाम सुन मन में रैगिंग का डर अपना ख्याल ला देता है लेकिन ये जरूरी नहीं कि हर सीनियर रैगिंग ही लेता हो, कुछ सीनियर ऐसे भी होते जो सोचने पर मजबूर कर देते। यूजी तक तो जूनियर सीनियर की परिभाषा से एकदम अनजान था बस रैगिंग के बारे में दीवारों पर पढा था ज्यादा कुछ नहीं जानते थे लेकिन जब शिक्षा के लिए पलायन करके देश के सबसे बड़े सूबे की राजधानी में एक कॉलेज में पहुचा तो सीनियरिटी जूनियरटी के बारे में थोड़ी सी समझ आई लेकिन इस माहौल में न रहने के कारण उस रंग में रंग तो नहीं सका लेकिन इस पहले पड़ाव पर सीनियर ऐसे मिले कि शुरुआती दौर में ही एक लेख लिखने को मजबूर होना पड़ा था कि ‘‘क्या ऐसे ही होते है सीनियर’’ वक्त का पहिया इतनी जल्दी चला कि शिक्षा के लिए पलायन के बाद शहर में पहला पड़ाव था अब वँहा से बिछुड़ कर आगे बढ़ने के लिए कुछ दिन ही बचे है जूनियर भी विदाई पार्टी की तैयारियों में जुट गए है ऐसे में उन सीनियर्स की याद आ ही जाती है जिनकी नसीहत आज जूनियरों को देते है। अपने मन की अपने जहन के जज्बातों को शब्दों में पिरोते हुए उन्हें थेँक्यू कहने की इस श्रृंखला में आज बात कर रहे है अनुप्रिया अग्रहरि मेम की

चंचल सा स्वभाव सूखी लकड़ी जैसी दिखने वाली जितनी पतली उतनी ही स्वभाव की अच्छी जब अनुप्रिया मैम की बात हो तो समझ नहीं आता शुरूआत कहॉ से करें। वैसे मिले तो हम लोग जूनियर -सीनियर के रिश्ते में लेकिन ये रिश्ता महज एक औपचारिकता ही रह गया था क्योंकि हम बन गए थे भाई-बहिन। वह हमें टिड्डा करके बुलाती तो हम उन्हें टिड्डी। वो हमें छोटू कहके बुलाती तो हम छुटकी मैम कह बुलाते थे। यानि कि इसी बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि कितने कम समय में कितने घुल मिल गए थे। कितने मानते थे हमारे सीनियर हमें। मैम का स्नेह और सपोर्ट न सिर्फ कॉलेज तक बल्कि कॉलेज के बाहर होने वाले अन्य ईवेटों में भी मिला जिनमें जाने का मौका मिला चाहे वो अब्दुल कलाम टैक्नीकल विश्वविद्यालय में हो या फिर और कहीं।


आज भी याद आते है वो पल जब बेवजह की बातों पर झगड़ा करते थे आज भी सताते है वो लम्हें जब सोशल मीडिया पर स्पैम करते हुए लगातार हजारों ईमोजी भेज देते थे और आप उन मैसेजों की संख्या का स्क्रीन शॉट लेकर अपने स्टेट्स पर लगा देती थी। याद है वो कहानी भी जब जबरदस्ती जपिंग कराकर वीडियो बना ली गई थी याद है वो किताब जिससे बर्थडे गिफ्त के रूप में आपको पसन्द आई थी लेकिन कुछ कारणों वश अभी तक पैड़िग में है।

लिखना तो बहुत कुछ चाहता पर क्या लिखूं समझ नहीं आता ... गुस्सा होने पर आपकी वो बात आज भी कानों में गूजंती है कि एक बात बोलूं तुम पागल हो....एक साल कब कितनी मौज में निकल गया पता ही नहीं चला आपसब का इतना स्नेह मिला कि किसी बात की फ्रिक ही नहीं थी क्योंकि मेरे रोने वाले या गुस्से वाले इमोजी को मजाक में भेजने पर भी तुरन्त सकारात्मक प्रतिक्रिया मिलती थी।

आपका साथ आपका स्नेह आप जैसा सीनियर मिला हर कदम पर साथ रहा। जल्द ही आप गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करने जा रही है तो आपको मंगलमयी शुभकामनाएं और हां भूलना नहीं....भूलना चाहो तो भी नहीं भूलने देगें.........क्योंकि अब हम शरारती जो हो गए है।

Wednesday, 24 April 2019

...........तो क्या दूध पीते हो?



घड़ी की सुई से कदमताल मिलकर निरन्तर चलने वाला वक्त अपने साथ बदलाव को भी सृजित करता चला जाता है जो वर्तमान पर आधुनिकता की पोशाक लिपेट कर भाविष्य को संभावनाओं में लपेट कर अतीत को इतिहास में समेट जाता है। इस बदलाव की चपेट में कुछ ऐसी भी चीजें आ जाती है जिन पर हमें गर्व होता है लेकिन उस पर पर्दापण करते हुए यह कह दिया जाता है कि नया जमाना है, बच्चे मॉर्डन हो रहे है। यही नया जमाना जिनको हमारा समाज बुरा मानती उसी ओर अग्रसित कर देती है और विश्वविद्यालयों, शिक्षण संस्थानों में पढ़ रहे युवाओं को मजबूरन इसके ओर आकर्षित होना पड़ता है नहीं तो ये सुनने को बड़े आराम से मिल जाएगा कि......तो क्या दूध पीते हो?

बात दिल को झकझोर के जरूर रख दे पर चिंतनीय है कल्पनाओं के आधार पर पोस्ट को जन्म नहीं दिया गया। गांव, कस्बों के युवा वहां शिक्षा के आभाव में अपने उज्जवल भविष्य को देखते हुए शहरों के शिक्षण संस्थानों की तरफ रूख कर अपने कस्वों गॉवों से पलायन करते है। भले ही 21 वीं सदी के इस भारत पर पश्चात् संस्कृति की कितनी भी धूल चिपक गई हो लेकिन गॉवों और कस्बे अभी इससे दूर है और सही मायनों में भारतीय संस्कृति को यही संरक्षित किए हुए है।

शिक्षा के लिए पलायन किया युवा शहरों के शिक्षण संस्थान में पहुॅचता है अधिकांश जगह जहॉ की कैटींनों में ऐसे युवा जरूर मिल जाएगें जो नशा के प्रेमी हो। नशा न शब्द को न समझने वाला वह गॉव का विद्यार्थी अब तक ज्वांइट, गांजा आदि के बारे में बड़ी गहराई से समझ लेता है लेकिन वह खुद को इन सब से दूर रखता है इष्टमित्रों द्वारा कहे जाने पर भी वह खुद को इन चीजों के पास न आने देता। खैर ये तो साधारण सी बात, लेकिन अचरज तब होता है जब भारतीय संस्कृति में देवी कहे जाने वाली एवं नवरात्रियों में पूजी जाने वाली नारी शक्ति भी नशे को पीने के लिए प्रोत्साहित करें और मना करने पर सम्भवतः उस युवक को बच्चा बता दिया जाए। अक्सर देखने को मिल जाएगा कि लड़कियां अपने सहपाठी युवाओं को नशे के लिए प्रोत्साहित करते दिख जाएगी जो न करता हो उससे पूछा जाएगा तो उसके मना करने पर यही शब्द सुनने को मिलता है कि क्या यार दूध तो पीते हो? तुम तो बच्चा हो...

नशे ने भी अपना टेंड बदल लिया है कोई भी अटपटा या मन मुताबिक न होने पर यह डॉयलॉग बड़ी आसानी से सुनने को मिल जाएगा कि सस्ता नशा किए हो क्या? जहॉ दूध और दही को अमृत के सामान माना जाता था आज वहॉ दूध और दही की जगह व्हिसकी और वीयर ने ले ली। कहा गया है कि जहॉ नारियों की पूजा होती है वहॉ देवता बसते है लेकिन भविष्य की अधिंकाश नारी को देखकर तो ऐसा लगता है कि यह कहावत भी जल्द ही इतिहास में विलीन हो जाएगी। वाकई हम तरक्की कर रहे है।

photo-google

Tuesday, 16 April 2019

माईबाप.....हम सब उस समाज का हिस्सा है जहॉ खुलकर रोने भी नहीं दिया जाता


जी हम बात कर रहे है उस समाज की जिस समाज के हिस्सा आप भी है, उस समाज की जहॉ स्त्री को तो खुलकर रोने की आजादी है लेकिन पुरूषों को नहीं, हम बात कर रहे उस सामज की जिसके मुॅह में तो सामानता के बड़े-बड़े भाषण है मगर बगल में वही पुरानी सोच। सब छोड़िये हम बात कर रहे पुरूष प्रधान उस समाज की जहॉ पुरूषों को रोना मना है और यदि वो रोते है तो लड़कियों की तरह.....

नवजात शिशु के पास भी रोने की कुदरती कला होती है, हर कोई रोना जानता है इससे सीखने के लिए किसी कॉलेज या मास्साब की जरूरत नहीं पड़ती फिर इसे दुर्भाग्य कहा जाए या विकासशील समाज..जहॉ लोगों को खुलकर रोने की आजादी तक नहीं है। जहॉ नारी घर से लेकर देश तक चला रही वहॉ पुरूषसत्ता पर निशाना साध नारी सशक्तिकरण की बात तो कर ली जाती है सामनता का हवाला भी दे दिया जाता है लेकिन कभी इसके ठीक विपरीत सामनता की बात करने वाले यह देखना उचित नहीं समझते कि हम सब उस समाज का हिस्सा है जहॉ खुलकर रोने भी नहीं दिया जाता। इनकी निगाहों में समानता को लेकर आज भी पुरूष और नारी के बीच गहरी खाई है। पुरूष रोते दिख जाए तो ये ताना जरूर मारा जाएगा कि क्या भाई, लड़कियों की तरह रोते होते ? अरे भाई इस समाज की मानें तो मर्द को दर्द नहीं होता इसलिए लड़कों की तरह रोए तो कैसे रोये ? कितना हास्यपद है न कि मर्द को दर्द नहीं होता और होता है तो वो लड़कियों की तरह रोता है..क्या यही 21 वीं सदी का हमारा श्क्षित समाज है? क्या पुरूष इंसान नहीं है? क्या उसके पास संवेदनाए नहीं है? क्या वो हालातों को नहीं समझता?
बबबबबबससस बहुत हो गया, चुप हो जाइए ........ हजूर .मर्द को भी दर्द होता है क्योंकि वो भी एक प्राणी है

Saturday, 13 April 2019

हालातों ने टेक दिए घुटने, पहियों ने भर दी उड़ान.....सुनेंगें जब सच्ची कहानी, तो न होगा यकीन



जी हां, समाज में आज भी ऐसे उदाहरण है जो हौसले और जज्बे को परिभाषित कर रहे है और प्ररेणा दे रहे है कि इंसान अपनी किस्मत खुद लिखता है। अपना भाग्य वह खुद रचता है। वैसे तो वक्त की मार ने अच्छे-अच्छे को हार मानने को मजबूर कर दिया, पर आज जिनकी बात हम कर रहे उन्होंने वक्त के सामने नहीं बल्कि वक्त ने उनके सामने पराजय स्वीकार कर ली है। हम बात कर रहे है प्रतापगढ़ में जन्मे, कल्याणपुर निवासी डा. वाई. पी. सिंह की। जिनके सामने हालातों ने घुटने टेक दिए और पहियों ने भर दी उड़ान......

डा. वाई. पी. सिंह का जीवन संघर्षों भरा रहा वह स्पोर्टस के शौकीन थे। सन् 1994 में खेल के मैदान पर ही समय ने उनकी परीक्षा ली और स्पाइनल कार्ड इंजरी ने उन्हें ताउम्र व्हील चेयर पर रहने को विवश कर दिया। इस कठिन समय में उन्होंने 4 साल अस्पताल में गुजारे इन कठिन परिस्थितियों में गीता के श्लोकों ने उन्हें भरपूर उर्जा दी।  अस्पताल में भर्ती होने के बाद डॉ. सिंह ने वित्त और सूचना प्रौद्योगिकी में दोहरी विशेषज्ञता के साथ प्रबंधन में स्नातकोत्तर डिप्लोमा में प्रवेश लिया और स्नातकोत्तर डिप्लोमा पूरा करने के बाद उन्होंने वित्त संकाय के रूप में अपना करियर शुरू किया और अपनी सीखने की प्रक्रिया को जारी रखा। जुलाई 2001 में उन्होंने अपना एम.कॉम पूरा किया। और उसी वर्ष उन्होंने लेखांकन सूचना प्रणाली ;एआईएस के क्षेत्र में लखनऊ विश्वविद्यालय में पीएचडी विद्वान के रूप में दाखिला लिया और एक रिकॉर्ड समय में मई 2004 मेंए उन्हें पीएचडी की उपाधि से सम्मानित किया गया और इस प्रकार साल दर साल डॉ. सिंह ने न केवल वित्त और लेखा के क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया बल्कि अकादमिक हलकों में भी पहचान हासिल की।

कभी हिम्मत न हारने वाले डा. वाई. पी. सिंह व्हीलचेयर पर रहकर ही विद्यार्थियों को अपनी अनूठी शिक्षण पद्धति से मुकम्मल मंजिल और सही दिशा देने का कार्य कर रहे है एवं आर्थिक मामलों पर कई किताबें भी लिख चुके है इसके साथ ही वह आइआइटी रूड़की जैसे संस्थानों में भी अपने सम्बोधन दे चुके है। राजस्थान के विद्यार्थियों के एक दल ने आकर इनसे विशेष रूप से शिक्षा ली। इसके साथ साथ बिजनेस एवं मीडिया स्कूल आई.आई.एस.ई में भी समय-समय पर विद्यार्थियों को मार्गदर्शित करने काम किया है।

डा. सिंह की निजी जिन्दगी की बात करें तो मौजूदा समय में वह तीन मिंजलें मकान में अकेले रहते है। अपने सफर को आसान बनाने के लिए इन्होंने इनोवेशन और तकनीकि का रास्ता चुना जिसके सहारे खुद ही अपने 3 मिंजला घर के सारे काम करते है। सिर्फ इतना ही नहीं डा. सिंह डाईविंग का भी शौक रखते है और वह 37,000 किमी तक अकेले ही डाइव किए है। गाड़ी चलाने में कोई दिक्कत न हो इसके लिए कार में हैंड ऑपरेटेड सिस्टम लगा रखा है इसमें पैरों के इस्तेमाल करने की जरूरत नहीं पड़ती। साथ ही घर पर एक डिवाइस लगा रखी है इसके जरिए रिमोट से ही घर के पंखें वल्ब आदि ऑन ऑफ कर सकते है।

डॉ सिंह ने अपने धैर्य और दृढ़ संकल्प से यह साबित कर दिया कि विकलांगता जीवन में ऊंचाइयों को प्राप्त करने में कोई बाधा नहीं है। सफलता प्राप्त करने का मुख्य मंत्र लोकप्रिय धारणाओं में विश्वास है, जहां इच्छा होती है, वहां एक रास्ता होता है, और भगवान उन लोगों की मदद करता है जो खुद की मदद करते हैं।

*डा. वाई. पी. सिंह से पारसमणि अग्रवाल की विशेष बातचीत*

Saturday, 6 April 2019

लड़के ही कसूरवार होते साहब, लड़कियां तो मासूम होती......


कहीं पढ़ा था कि लड़की जब तक गुनाहगार नहीं होती जब तक वह आरोपी साबित नहीं हो जाता और लड़के तब तक दोषी होते जब तक निर्दोष साबित नहीं हो जाते। पढ़ने में ये लाइनें जितनी गहराई से दिल को छू जा रही उतनी ही मजबूती के साथ यही पक्तियां हमारी मानसिकता और हमारी व्यवस्था की बखेड़िया उधेर रही है क्योंकि हम बात तो करते है समानता की, हम बात तो करते है एक हाथ से ताली न बजने की, हम बात तो करते है बुद्धजीवि होने की, हम बात तो करते है निष्पक्ष न्याय की जब बात आती है अमल में आने की तो भूल जाती है हमारी व्यवस्था, पा्रप्त मौलिक अधिकार के अनुच्छेद 14 एवं 15 को, क्योंकि लड़के ही कसूरवार होते साहब, लड़कियां तो मासूम होती।

अनुच्छेद 14 एवं 15 क्रमशः स्पष्ट बताता है कि विधि के समझ समानता एवं धर्म, वंश, जाति, लिंग और जन्म स्थान आदि के आधार पर भेदभाव नहीं किया जायेगा जो न्यायालय में वाद योग्य भी है। लेकिन शायद हमारा समाज, हमारी व्यवस्थायें दोहरे रास्तों पर कदमताल कर रही है जो खुद में ही मजाक बन रही है। 

लड़के ही कसूरवार होते, लड़कियां तो भोली होती यह बात जितनी हास्यपद है इसका प्रमाण उतना ही सटीक। तभी तो अक्सर समाचार पत्रों में छपने वाली खबरें खुद वा खुद इसकी सच्चाई बयां कर देती है। आजतक किसी भी समाचार पत्र/पत्रिकाओं में यह पढ़ने को नहीं मिला कि  कोई लड़की मासूम से लड़के को बहला फुसलाकर भगा ले गई। लेकिन ये खबर बड़ी आसानी से सुनने को मिल जाएगी कि युवक हुआ मासूम युवती को लेकर नौ दो ग्यारह।

सुना तो था कि पॉचों अगुलियां एक सी नहीं होती तो फिर ये कैसे हो सकता कि सामने आई इतनी घटनाओं में कोई लड़का मासूम न हो। क्या सारी लड़कियां ही मासूम होती? चलो यकीन कर लेते है कि लड़कियां मासूम होती और लड़के ही कसूरवार होते। लेकिन यह सवाल इस बात को निगलने नहीं देता और गले की फांस सा चुभता है कि जब लड़कियां मासूम होती है तो दहेज उत्पीड़न/नारी उत्पीड़न के अधिकतर मामलों में कसूरवार सास और नन्द भी तो महिलाए होती तो ये कैसी मासूमियत कि एक महिला होते हुए भी एक महिला पर अत्याचारों का खंजर चला दिया जाता है, कभी उसे अग्निस्नान करा दिया जाता है तो कभी उसे बेघर कर दिया जाता है।

साहब..ताली एक हाथ से नहीं बजती तो फिर समझौता एक तरफा क्यों? सजा एक तरफा क्यों ? एक को उसके परिजनों के हवाले सौंप दिया जाता तो दूसरे को हवालात के हवाले ये कैसी परम्परा? कहां चले जाते है इस वक्त समानता की बात करने वाले? कहॉ गुमनाम हो जाते है निष्पक्ष न्याय की बात करने वाले। सोचकर देखिए कितना हास्यपद लगता है कि घर से लेकर देश तक चलाने वाली 21 वीं सदी की महिला आज भी इतनी भोली है कि वह बहला-फुसलाकर किसी के साथ भी चलने को तैयार हो जाती है। मेरे लिए भी महिला उतनी ही सम्मानीय है जितनी आपके लिए .. लेकिन साहब जब बात समानता की कर रहे तो उसे अमल में भी तो लाइये।

photo- google se

Wednesday, 27 March 2019

भूत और भ्रम सवालों की मेढ़ पर कन्फूज

बड़े-बड़े सृजनकर्ताओं का मानना है कि एक लेखक अपनी रचनाओं को स्वंय जीता है, बात सौ फीसदी सही लगती है लेकिन आज जो लिख रहे उसमें कुछ अचरज सा है, कुछ हकीकत है तो कुछ फसाना है क्योंकि अभी तक भूत होने और डर जाने की गुत्थी में खुद उलझे हुए है और ऐेसे में ही इनके डर से बचने के उपाय फोन पर मिल जाने के बाद इसको जानने की लालषा में सुलहग रही चिंगारी एक षोला बन जाती है और सही जवाब न मिलने पर ऐसा लगता है कि जैसे ये दोनों ही अपने अस्तित्व की लड़ाई रह रहे और साथ ही है भूत और भ्रम सवालों की मेढ़ पर कन्फूज ....

बचपन में घर के आंगन में बैठ कहानियां सुना रहे होते दादा-दादी अक्सर राजा-रानी की कहानियों को सुनाया करते थे लेकिन ऐन केन प्रकरेण समय-समय पर इन लम्हों के बीच भूत भी बातचीत का टॉपिक बन जाता है तो बात बात में बताया जाता था कि भूत-बूत कुछ नहीं होता ये सब मन का भ्रम है। चलो ठीक मान लिया कि ये मन का भ्रम है।

लोगों द्वारा अक्सर यह भी सुनने को मिलता है कि 84 लाख योनियां होती है सबकी आयु निष्चित होती है जो आयु पूरी किए बिना ही आकस्मिक कारणों से अपनी आयु पूरी नही कर पाते है और निधन हो जाता है तो वह आयु पूरी होने तक भटकता रहता है। आयु पूरी होने के बाद ही उसे मुक्ति मिलती है। ये और भूत भ्रम है दोनों बातें आपस में कट्टर विरोधाभास प्रदर्षित करती प्रतीत होती है।

आयु पूरी न होने तक मुक्ति न मिल पाने की बातको यह बात भी मजबूती प्रदान करती है जो कि अपने बड़े-बूढ़ों से ही सुनने को मिलती है कि भटकती आत्मा को श्रीमद् भागवत कथा से मुक्ति मिल जाती है। वास्तविकता क्या है यह तो भगवान ही जानें। पर यहां सवाल मन में यह उठता है कि उम्र पूरी न होने के वाबजूद आकस्मिक कारणों से तन छोड़ चुकी आत्मा जब भटकती है तो क्या वही तो भूत नहीं, यानि कि भूत ही भ्रम है बात एकदम झूठी प्रतीत होती है।

मैं यह तो नहीं कह सकता कि भूत होता है या नहीं होता है लेकिन हां कुछ तो है जो भूत होने की अनुभूति करवा देता है। अपने बसेरे के तीसरे मंजिल पर कमरे के बदलने के वाबजूद भी समय-समय पर कुछ डरावना सा महसूस हुआ इसलिए मैं पूर्ण भरोसे के साथ तो कह सकता हॅू कि कुछ न कुछ तो होता है क्योंकि धोखा एक बार ही खाया जा सकता है बार-बार नहीं।

जब भूत और भ्रम की बात हो और ऐसे नजारे मन के कैनवास पर खुद को न उकेर दे तो बात ताज्जुब भरी होगी कि जब देखने को मिल जाता है कि लोगों पर हवा-बैर या जो भी हो उसका प्रभाव हो जाता है जिससे वह अजीब सी हरकतें करने लगता है फिर तंत्र विद्या से उसे ठीक होते देखा है। ये सब बातें अभी तक सवालों के हल को एक गुत्थी के तरह उलझाने में लगी हुई है। दोतरफी बातें सुनकर अब तक यही समझ आया कि भूत और भ्रम सवालों के मेंढ़ पर कन्फूज है।

Tuesday, 26 March 2019

खुशहाली और प्रसन्नता को जीना सीखें, शीघ्रता करें, सीमित सीटें

थोड़ा अटपटा जरूर लग रहा हो कि खुशहाली को जीनें और सीखने के लिए स्कूल भी होंगे? जी हां, सही पढ़ रहे है अतीत के आंकड़ो के स्तम्भ को धराशाई कर वर्तमान खुशहाली के नये आंकड़ो को गढ़ भविष्य में ऐसे स्कूल खोलने के अवसरों को बड़े ही जोरों-शोरों से न्यौता दे रहा है जहॉ खुशियों को जीना सिखाया जाएगा, अब अजीब लग रहा न, लेकिन ये हम नहीं कह रहे ये बात हाल में ही आए संयुक्त राष्ट की ओर से जारी विश्व प्रसन्नता रिपोर्ट स्पष्ट कहती प्रतीत हो रही है कि वह दिन दूर नहीं जब ये आसानी से सुनने को मिल जाएगा कि ‘‘ए चाचा, इत्तो मुंह काए बनाए, चलो खुशहाली सीखने स्कूल चलें‘‘

आपको बता दें कि संयुक्त राष्ट की ओर से जारी विश्व प्रसन्नता रिपोर्ट 2019 में भारत अपने स्तर में बढ़ोत्तरी करने के बजाए प्रसन्नता के ग्राफ में गिरावट पाया है जो कि बेहद ही चिंतनीय एवं विचारणीय है। रिपोर्ट में भारत को 140 वां स्थान मिला जबकि पिछले साल 133 वें स्थान पर था। एक साल में ही इतने पायदान नीचे खिसक जाना हमारे जिम्मेदार, हमारे समाज और हम सब के लिए आत्ममंथन की आवश्यकता को मजबूतीदेश के लिए शुभ संकेत नहीं है क्योंकि तनाव से मुक्त होकर खुशहाली और प्रसन्नता हर कोई चाहता है।
प्रदान कर रहा ह्रै। खुशहाली एवं प्रसन्ननता के मामले में लगातार पिछड़ना हमारे हमारे देश के लिए शुभ संकेत नहीं है क्योंकि तनाव से मुक्त होकर खुशहाली और प्रसन्नता हर कोई चाहता है।


विचार करना होगा, समय रहते रणनीति बनानी होगी और धरातल पर परीक्षण करना होगा कि आखिर खुशहाली के मामले में हम पिछड़ते जा रहे है? कहां कमियां रह रही है हमारी समाज निर्माण की नीतियों में, कहां कमी रह रही है हमारी शासन व्यवस्था में ? किन कदमों इसको सुधारा जा सकता है क्योंकि एक अच्छे देश का निर्माण पत्थर और चट्टानों से नहीं बल्कि उस देश के खुशहाल नागरिकों से होता है।

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Monday, 25 March 2019

अंकल....अंकल, देखो न, पत्रकारिता बाजार में बिक रही है........



जो सियासत की चाल को बदलने की दम रखती हो, कुरीतियों पर प्रहार करती हो, अव्यवस्थाओं की बखेड़िया उधेरने का दम भरती हो, जो मजलूमों की आवाज बन खड़ी होती हो, समाज की दशा एवं दिशा बदलने का साहस रखती हो, जो चौकन्नी, बेबाक और निष्पक्षता के साथ चलती हो जो लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के रूप मे जानी जाती हो जो दर्पण के रूप में पहचानी जाती हो वही पत्रकारिता बिक रही है।

अंकल.....अंकल देखो पत्रकारिता बिक रही है, देखो न अंकल पत्रकारिता बिक रही है, कोई भी ले सकता है उसे, चलो न अंकल खरीदते है, न योग्यता की जरूरत है न डिग्री की बस मामूली से अर्थ की, प्लीज अंकल चलो न, उस हाट में चलते है हम भी पत्रकार होने का तगमा ले आते है फिर मजे से सरकारी दफ्तरों की चाय का मजा मिलेगा, मंत्री नेताओं से दोस्ती का अवसर मिलेगा चलो न अंकल.......प्लीज

जी, सही सुन रहे है आप पत्रकारिता बिक रही है। क्या आप भी खरीदना चाहते है? अरे आइये न, काहे माथे पर इतनी चिंता की लकीरें लिए कि देख के ही अटैक आ जाए....चलिए..चलिए..अब मुस्कुरा भी दीजिए....आहा...ये हुई न बात...देखो कितने अच्छे लग रहे। देखो पत्रकार बनने की ज्यादा कठिन प्रक्रिया नहीं है, बस ये निर्णय लो कि कौन सा पेपर चाहिए....दैनिक....सप्ताहिक....पाक्षिक

आप भी समझदार है। जितनो गुण डालोगे उतनो ही मिठो हुए। इसलिए जैसो अखबार वैसी सिक्योरिटी। बस सिक्योरिटी जमा करो अखबार का कार्ड तुम्हारा भी बन जाएगा यानि कि तुम भी पत्रकार बन जाओगे बस फिर धड़ल्ले से करो पत्रकारिता। हा एक बात को ध्यान रखियो तीज त्यौहार पर ज्यादा से ज्यादा विज्ञापन लेने की कोशिश करना वाए कमीशन तुम्हारा भी है...समझदार हो समझ गए न

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Thursday, 14 March 2019

कसूर क्या था, बस इश्क ही तो किया था,...

कोई पागल कहता रहा कोई देवदास समझता रहा।
नए नए तरीकों से वो, जख्मों पर मरहम मलता रहा।

कसूर क्या था, बस इश्क ही तो किया था,
छीनकर मुस्कुराहट,जमाना न जाने क्यों हंसता रहा?

सोने में ही अब गुजर जाते है दिन और रात,
होके गीली आंखें, कागजों पर ही अब दर्द रिस्ता  रहा।

कांटो से सिलकर अपनी मुस्कुराहट को,
बेबसी के आलम में,खुद ही खुद में पिस्ता रहा।

समझाने वाले तो हर मोड़ पर मिले
समझने वाला मिल सके, ऎसा न कोई रास्ता रहा।

Paras mani agrawal


Monday, 11 March 2019

नारी सशक्तिकरण की कोख में पुरूष विर्मश का नवांकुर पनप रहा है...




साल के 356 दिन में नारी को एक दिन में अर्थात् महिला दिवस के रूप में समेट लाने की प्रथा बड़े-बड़े समाचार पत्रों में बड़ी-बड़ी फोटो के साथ प्राथमिकता के साथ प्रकाशित होती है। अच्छी बात है, हालांकि भारत की नारी ने समय समय पर खुद को सबला साबित किया है और बता दिया है कि अगर महिलाएं खुद सोच लें तो दुनिया में कोई भी इतना ताकतवर नहीं है जो महिलाओं को उनकी स्वतंत्रता भीख में दे सके। खैर, आप आजाद भारत के आजाद नागरिक है। आपकी प्रतिक्रिया भी सर्वोपरि है लेकिन काश समानता का अलाप रागने वाले, नारी को अबला बताने वाले एकतरफा न सोच जरा इस बात पर भी अपनी नजर डालते की नारी सशक्तिकरण की कई फंलागों से चली आ रही मुहिम कितनी कारगर साबित हो रही है?  

यदि सालों से नारी को सशक्त बनाने के प्रयासों के बाद यदि आज भी नारी सशक्तिकरण के नाम पर नारी को कमजोर बताने की जरूरत पड़ रही है तो हमारे प्रयासों में कहां कमी रह गई हैं? और यदि हमारे प्रयास सही दिशा में चल रहे तो कहीं ऐसा कोई तबका तो नहीं जो इससे प्रभावित हो रहा हो? इसको गलत उपयोग में लाया जा रहा हो? कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारे प्रयास दिशाहीन होकर सामानता की भावना के साथ तू डाल-डाल, मैं पात-पात का खेल खेल रहे हो? धरातल पर आइये साहब....रटारटाया सम्बोधन देकर अपनी फोटो छपवा लेने भर से काम नहीं चलने वाला। थोड़ा अटपटा जरूर लग रहा होगा मगर ये सच है कि नारी सशक्तिकरण की कोख में पुरूष विर्मश का नवांकुर पनप रहा है...

बिल्कुल सही सुने वही पुरूष विर्मश का नवांकुर जो संविधान की भावनाओं के साथ खेल रहा है, जो न कि सामाजिक व्यवस्था में अवरोधक साबित हो सकता है बल्कि विर्मश का स्वरूप ही बदल रहा है। यह सर्व सामानता की भावना को भी कठघरे में घसीट रहा हैं। कहा जाता हैं कि नारी पुरूष एक गाड़ी के दो पहियों की भांति होता है और पंचर होने की बात तो छोड़ दीजिए यदि एक भी पहिये में हवा भी कम हो जाती है तो सुखद जिदंगी डगमगा जाती है।

कभी आंकड़ों पर गौर कीजिए नारी के द्वारा पुरूष उत्पीड़न के आंकड़े देखकर दिल दहल जाएगा और आप स्वंय ही इस बात को कह उठेंगें कि ‘‘हां, नारी सशक्तिकरण की कोख में पनप रहा पुरूष विर्मश का नवांकुर।’’ इस बात का सत्यापन नारियों के द्वारा सताए गए पुरूषों के आंकड़े स्वंय अपनी स्थिति बता रहे है और चीख-चीख कर कह रहे है कि नारी सशक्तिकरण का दुरूपयोग पुरूष वर्ग को कमजोर बनाने पर तुला है। मैं यह नहीं कहता कि नारियों का सम्मान न हो उन्हें उनका हक न मिले। लेकिन बात समानता की है तो सामान रूप से मिले। कम से कम एक बार विचार अवश्य कीजिए


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