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गाँव का हुनर शहर की चौखट पर क्यों दम तोड़ता है?

 कितनी प्रतिभाएँ सिर्फ इसलिए अपनी प्रतिभा को खुद में दफन कर लेती हैं क्योंकि उनके घर से शहर बहुत दूर होता है?
यह सवाल सुनने में जितना छोटा है, इसके भीतर उतनी ही बड़ी त्रासदी छिपी है। किसी गाँव की पगडंडी पर रोज नंगे पाँव दौड़ता बच्चा शायद देश का अगला चैंपियन हो सकता है। किसी कच्चे घर में धीमे सुरों में गाती बच्ची शायद कल की बड़ी गायिका बन सकती है। किसी सरकारी स्कूल की आखिरी बेंच पर बैठकर कॉपी के पीछे चित्र बनाता बच्चा शायद कलाकार बन सकता है।
लेकिन उनकी प्रतिभा को पहचानने वाला कौन है?
वे बच्चे हारते नहीं हैं। उन्हें हराया जाता है—अवसरों की कमी से।
किसी को कोच नहीं मिलता, किसी को मैदान नहीं मिलता, किसी को साधन नहीं मिलते और किसी को यह बताने वाला तक नहीं मिलता कि उसके भीतर छिपा हुनर उसे कहाँ तक ले जा सकता है।
शहर में प्रतिभा के लिए अकादमी है, प्रशिक्षक है, मंच है, प्रतियोगिता है। गाँव में अक्सर सिर्फ प्रतिभा है।
और फिर व्यवस्था कहती है शहर आओ।
लेकिन वह बच्चा शहर आए तो आए कैसे? जिस घर में महीने का हिसाब चूल्हे और राशन से तय होता है, वहाँ बच्चे की अकादमी की फीस, आने-जाने का खर्च और उपकरणों की कीमत कैसे निकलेगी?
यहीं कोई बच्चा अपना सपना छोड़ देता है।
न कोई हार का प्रमाणपत्र मिलता है, न कोई खबर छपती है।
बस एक दिन वह दौड़ना बंद कर देता है।
एक दिन वह गाना बंद कर देती है।
एक दिन रंग सूख जाते हैं।
और एक प्रतिभा, जिसके बारे में दुनिया को कभी पता ही नहीं चला, रोजमर्रा की जिंदगी में कहीं गुम हो जाती है।
हम अक्सर कहते हैं—“गाँवों में बहुत प्रतिभा है।”
लेकिन असली सवाल यह है कि हमने उस प्रतिभा को खोजने के लिए गाँव का रास्ता कितनी बार पकड़ा?
जब प्रतिभा गाँव में पैदा होती है, तो अवसर शहर में क्यों मिलता है?
क्यों अकादमी बच्चे के पास नहीं जा सकती?
क्यों प्रशिक्षक गाँव के मैदान तक नहीं पहुँच सकता?
क्यों प्रतिभा खोजने वालों को पगडंडियों तक जाने में इतनी दूरी महसूस होती है?
गाँव का बच्चा दया नहीं चाहता। वह सिर्फ बराबरी का अवसर चाहता है।
उसे एक मैदान चाहिए, एक प्रशिक्षक चाहिए, एक मंच चाहिए और कोई ऐसा हाथ चाहिए जो उसके कंधे पर रखकर कह सके “तुम कर सकते हो।”
क्योंकि हो सकता है, आज किसी गाँव की धूल में नंगे पाँव दौड़ रहा वह बच्चा कल देश के लिए पदक जीते।
लेकिन अगर आज उसे दौड़ने का मौका ही नहीं मिला, तो कल हम किस बात का जश्न मनाएँगे?
सवाल सिर्फ यह नहीं कि गाँव का हुनर शहर की चौखट पर क्यों दम तोड़ता है। सवाल यह है कि वह चौखट गाँव तक कब आएगी?

पारसमणि अग्रवाल 

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