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कहानी -- अंधेरी गली की रोशनी


“खाला... तुमसे भी मिलने नहीं आ सकता क्या?”

मासूमियत से भरी यह आवाज़ थी वरदान की।

सरोज कुछ क्षणों तक उसे देखती रही। जैसे उसके कानों ने जो सुना था, उसे दिल स्वीकार करने में थोड़ा वक्त ले रहा हो। बरसों से जिस शब्द को उसने केवल दूसरों के रिश्तों में सुना था, आज वही शब्द किसी अनजान लड़के की जुबान से उसके लिए निकला था—खाला।

उस एक शब्द ने सरोज के भीतर जैसे किसी पुराने, बंद पड़े दरवाजे पर दस्तक दे दी।

दिल्ली की उस बदनाम गली में जहां लोग चेहरों से ज्यादा जिस्मों को पहचानते थे, जहां रिश्तों की कीमत अक्सर पैसों से तय होती थी और जहां आने वाले अधिकांश लोगों की निगाहों में औरत केवल एक देह होती थी, वहीं अचानक एक ऐसा रिश्ता जन्म ले रहा था जिसकी कोई कीमत नहीं थी।

वरदान दिल्ली अपने सपनों को लेकर आया था।

छोटे शहर का रहने वाला वरदान दिल्ली को लेकर तमाम कल्पनाएं अपने मन में सजाए हुए था। ऊंची-ऊंची इमारतें, चमचमाती सड़कें, बड़े-बड़े दफ्तर, तेज रफ्तार जिंदगी और उन सबके बीच अपने लिए एक छोटी-सी जगह बनाने का सपना।

उसे क्या पता था कि सपनों के इस शहर की कुछ गलियां ऐसी भी हैं, जहां रोशनी बहुत होती है, लेकिन जिंदगी अंधेरे में सांस लेती है।

उस दिन नौकरी की तलाश में भटकते-भटकते वह जाने कब उस इलाके में पहुंच गया, जिसे वहां के लोग भी धीरे से नाम लेते थे।

वरदान को वहां के माहौल का जरा भी अंदाजा नहीं था।

वह आसपास देखता हुआ आगे बढ़ रहा था। चेहरे अलग थे, आवाजें अलग थीं और निगाहें तो बिल्कुल ही अनजान।

उसी समय एक बूढ़ी औरत की नजर उस पर पड़ी।

वह सरोज थी।

उम्र ने उसके चेहरे पर कई लकीरें खींच दी थीं, लेकिन आंखों में अब भी एक अजीब-सी चमक थी। ऐसी चमक, जिसमें दर्द भी था और जिंदगी से लड़ते रहने की जिद भी।

सरोज ने वरदान को गौर से देखा और फिर तेज आवाज में बोली—

“तुम इधर क्या कर रहे हो?”

वरदान सकपका गया।

“जी... मैं... बस ऐसे ही जा रहा था।”

“ऐसे ही?”

सरोज ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा।

“तुम्हें मालूम भी है ये कौन-सी जगह है?”

वरदान ने सिर हिला दिया।

“नहीं।”

सरोज के चेहरे पर चिंता उभर आई।

“तो फिर यहां से तुरंत निकल जाओ। जितनी जल्दी हो सके। पुलिस कभी भी छापा मार सकती है। और अगर किसी ने तुम्हें पकड़ लिया तो न जाने क्या समझेगा।”

वरदान कुछ कदम पीछे हटने ही वाला था कि उसने सरोज की ओर देखा।

उसकी आंखों में डर था, लेकिन उससे ज्यादा जिज्ञासा।

“लेकिन... आप मुझे क्यों बचा रही हैं?”

सरोज ने कोई जवाब नहीं दिया।

वरदान ने मासूमियत से पूछा—

“आप मेरी खाला जैसी लगती हैं... क्या मैं आपसे मिलने भी नहीं आ सकता?”

सरोज जैसे पत्थर की हो गई।

“क्या कहा?”

“खाला...”

वरदान मुस्कराया।

“मेरी अपनी खाला यहां नहीं रहतीं। आप मुझे डांट भी रही हैं और बचा भी रही हैं। इसलिए लगा... आप खाला जैसी ही तो हैं।”

सरोज ने नजरें झुका लीं।

कितने बरस हो गए थे किसी ने उसे इस तरह अपनापन देकर बुलाया नहीं था।

लोग उसे नाम से बुलाते थे।

कुछ लोग उससे भी बदतर शब्द इस्तेमाल करते थे।

लेकिन “खाला”...

यह शब्द उसके लिए किसी पुरस्कार से कम नहीं था।

सरोज की आंखें भर आईं।

उसने खुद को संभालते हुए कहा—

“चलो मेरे साथ।”

“कहां?”

“पहले यहां से निकलो। बाकी बातें रास्ते में।”

वरदान चुपचाप उसके पीछे चल पड़ा।

कुछ ही दूर एक छोटे से ढाबे पर सरोज उसे ले गई।

दोनों एक कोने में बैठ गए।

वरदान के चेहरे पर अब भी डर था। वह बार-बार पीछे मुड़कर देख रहा था।

सरोज ने पूछा—

“डर रहे हो?”

वरदान ने धीरे से कहा—

“थोड़ा।”

“डरना भी चाहिए। लेकिन घबराना नहीं।”

फिर सरोज ने उसकी तरफ देखते हुए कहा—

“और सुनो, मेरे होते हुए तुम्हें कोई हाथ तक नहीं लगा सकता। तुम तक पहुंचने से पहले उसे मुझसे जूझना पड़ेगा।”

वरदान ने पहली बार सरोज को गौर से देखा।

वह बूढ़ी थी।

कमजोर दिखाई देती थी।

लेकिन उसकी आवाज में ऐसी दृढ़ता थी, जैसे उसने जिंदगी से हजार बार लड़कर यह आवाज हासिल की हो।

वरदान के मन में कई सवाल उठ रहे थे।

यह औरत कौन है?

यह यहां क्यों रहती है?

इसके अपने लोग कहां हैं?

इसने मुझे देखकर इतनी चिंता क्यों की?

और सबसे बड़ा सवाल—

इसे “खाला” कहने पर इसकी आंखें क्यों भर आईं?

ढाबे वाला चाय लेकर आया।

सरोज ने चाय वरदान की तरफ बढ़ाई।

“लो।”

“आप नहीं लेंगी?”

“मैं रोज पीती हूं। आज तुम पी लो।”

वरदान ने कप हाथ में लिया।

कुछ क्षण तक दोनों चुप रहे।

फिर वरदान ने धीरे से पूछा—

“खाला... आप यहां कब से रहती हैं?”

सरोज ने उसकी तरफ देखा।

“बहुत सालों से।”

“क्यों?”

सरोज हल्का-सा मुस्कराई।

“हर कहानी का जवाब एक शब्द में नहीं मिलता बेटा।”

वरदान चुप हो गया।

सरोज ने चाय की एक घूंट ली और दूर सड़क की तरफ देखने लगी।

फिर बोली—

“अगर सुनना चाहते हो तो सुनो। लेकिन सुनकर मेरे लिए तरस मत खाना।”

“मैं तरस नहीं खाऊंगा।”

“क्यों?”

“क्योंकि आपने मुझे बचाया है। मैं आपको कमजोर कैसे समझ सकता हूं?”

सरोज के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।

“तुम्हारी उम्र कितनी है?”

“तेईस।”

“और इतनी बड़ी-बड़ी बातें?”

“आपसे सीख रहा हूं।”

सरोज पहली बार खुलकर हंसी।

उस हंसी में बरसों बाद शायद कोई सुकून था।

---

सरोज ने अपनी कहानी शुरू की।

“जब मैं छह साल की थी, तब मेरे मां-बाप दोनों चल बसे।”

वरदान का चेहरा गंभीर हो गया।

“मैं और मेरे छोटे भाई-बहन अकेले रह गए थे। रिश्तेदार थे, लेकिन रिश्ते केवल नाम के थे। कुछ दिनों तक किसी के घर, कुछ दिनों तक किसी के घर... आखिर एक पहचान के चाचा अपने साथ ले गए।”

सरोज थोड़ी देर चुप रही।

“उस वक्त समझ नहीं आता था कि गरीबी क्या होती है, बेबसी क्या होती है और अकेलापन किसे कहते हैं। बस इतना जानती थी कि पेट भरने के लिए रोटी चाहिए और रात को सोने के लिए छत।”

“फिर?”

“फिर वक्त बीतता गया। मैं बड़ी हुई। मेरी एक छोटी बहन थी और एक छोटा भाई। दोनों की आंखों में सपने थे। मेरे मां-बाप ने मरने से पहले मेरे सिर पर हाथ रखकर कहा था—‘बच्चों को पढ़ाना।’”

सरोज की आवाज भर्रा गई।

“मैंने उस दिन तय कर लिया था कि चाहे कुछ भी हो जाए, मैं अपने भाई-बहन को पढ़ाऊंगी।”

वरदान ध्यान से सुन रहा था।

“युवा हुई तो नौकरी की तलाश शुरू की। मुझे लगता था कि नौकरी मिल जाएगी तो सब ठीक हो जाएगा।”

“मिली?”

“हां।”

सरोज की आंखों में एक पल के लिए पुरानी खुशी लौटी।

“पहली नौकरी मिली तो लगा जैसे जिंदगी बदल गई। पहली तनख्वाह हाथ में आई तो मैं पूरी रात सो नहीं पाई थी। पैसे बहुत कम थे, मगर मुझे लगता था कि मैं आसमान खरीद लाई हूं।”

“फिर क्या हुआ?”

सरोज ने गहरी सांस ली।

“ऑफिस में कुछ ही समय बीता था कि मेरे बॉस की नजर बदलने लगी।”

वह कुछ क्षण चुप रही।

“पहले तारीफें हुईं। फिर अकेले बुलाना। फिर अनावश्यक छूने की कोशिशें। मैंने विरोध किया तो काम में कमियां निकाली जाने लगीं। मैंने आवाज उठाई तो मुझे ही दोषी ठहराने की कोशिश हुई।”

वरदान की मुट्ठियां भींच गईं।

“मैंने नौकरी छोड़ दी।”

“फिर?”

“फिर दूसरी नौकरी ढूंढी।”

सरोज हंसी, लेकिन वह हंसी दर्द से भरी थी।

“मुझे लगा था दूसरी जगह शायद इंसान मिलेंगे।”

“मिले नहीं?”

“नहीं।”

उसने धीरे से कहा—

“हर जगह कोई न कोई भेड़िया मिल जाता था।”

“फिर आप...”

“हां, मैं थक गई थी।”

सरोज की आवाज अब बहुत धीमी थी।

“शरीर से ज्यादा दिमाग थक गया था। हर पुरुष पर शक होने लगा था। हर बंद दरवाजे से डर लगने लगा था। हर अकेली जगह खतरा लगती थी।”

उस समय सरोज की एक सहकर्मी थी—मधु।

“मधु मेरी हालत देखती थी। वह मुझे समझाती थी। एक दिन वह मुझे इसी इलाके में ले आई।”

वरदान चौंक गया।

“उसने कहा—‘उन लोगों के हाथों रोज-रोज टूटने से अच्छा है कि कम से कम अपने फैसले खुद लो। यहां रहकर अपने भाई-बहन का भविष्य बना।’”

“और आपने उसकी बात मान ली?”

“हां।”

सरोज ने सिर हिलाया।

“क्योंकि मेरे सामने दो रास्ते थे। एक ऐसा रास्ता जहां हर कदम पर कोई मेरी मजबूरी खरीदना चाहता था, और दूसरा ऐसा रास्ता जहां कम से कम मैं अपने भाई-बहन की जिंदगी बदल सकती थी।”

“क्या आपको डर नहीं लगा?”

“बहुत।”

“फिर भी?”

“डर के साथ जीना सीख लिया।”

सरोज की आंखों में अब आंसू थे।

“मुझे लोगों ने बहुत कुछ कहा। गालियां दीं। चरित्र पर सवाल उठाए। लेकिन मैंने किसी से नहीं पूछा कि मेरे हिस्से की मजबूरी कौन बांटेगा?”

वरदान कुछ बोल नहीं पाया।

सरोज ने आगे कहा—

“लोगों ने मेरे शरीर को देखा, मेरे भीतर की औरत को नहीं। उन्होंने मेरे पेशे को देखा, मेरे संघर्ष को नहीं। उन्होंने मेरी मजबूरी देखी, मगर मेरे भाई-बहन के सपने नहीं देखे।”

वह कुछ देर चुप रही।

“लेकिन मैंने हार नहीं मानी।”

“आपने क्या किया?”

“जो कमाया, उसका बड़ा हिस्सा घर भेजती रही।”

“और आपके भाई-बहन?”

सरोज की आंखों में गर्व उतर आया।

“मेरा भाई आज केंद्रीय विद्यालय में शिक्षक है।”

वरदान मुस्कराया।

“सच?”

“हां। पिछले पांच सितंबर को उसे शिक्षक दिवस पर सम्मान भी मिला था।”

“और आपकी बहन?”

सरोज की आंखें चमक उठीं।

“एमबीबीएस डॉक्टर है।”

वरदान ने खुशी से कहा—

“खाला! आपने तो कमाल कर दिया।”

सरोज ने उसकी ओर देखा।

“नहीं बेटा। मैंने सिर्फ अपना वादा निभाया।”

“फिर भी...”

“मैंने उन्हें पढ़ाया जरूर, लेकिन उनकी मेहनत उनकी अपनी थी।”

उसने मुस्कराते हुए कहा—

“जब मेरा भाई पहली बार शिक्षक बनकर मेरे सामने आया था न, तब मैंने उससे कहा था—‘बेटा, आज तूने अपनी मां-बाप की आत्मा को जवाब दे दिया।’”

“और बहन?”

“वह जब डॉक्टर बनी तो मैंने उसे बस इतना कहा—‘अब किसी गरीब की फीस देखकर इलाज मत रोकना।’”

दोनों कुछ देर तक चुप रहे।

---

उस शाम वरदान जब वहां से जाने लगा तो सरोज ने उसे रोक लिया।

“फिर आओगे?”

वरदान ने मुस्कराकर कहा—

“अगर खाला बुलाएंगी तो जरूर।”

“बुलाऊंगी नहीं... डांटकर बुलाऊंगी।”

“ठीक है।”

वरदान कुछ कदम आगे बढ़ा, फिर वापस मुड़ा।

“खाला?”

“हां?”

“मैं सच में आपसे मिलने आ सकता हूं न?”

सरोज ने उसकी ओर देखा।

इस बार उसकी आंखों में आंसू नहीं थे।

उसने सिर हिलाया।

“हां बेटा। जब मन करे आ जाना।”

उस दिन के बाद वरदान और सरोज के बीच एक ऐसा रिश्ता बन गया, जिसे किसी खून के रिश्ते की जरूरत नहीं थी।

दिल्ली आने पर वरदान सरोज से मिले बिना नहीं जाता।

कभी मिठाई ले आता।

कभी फल।

कभी अपने शहर की बनी कोई छोटी-सी चीज।

सरोज भी उसके लिए कुछ न कुछ बचाकर रखती।

“ये शर्ट तुम्हारे लिए लाई हूं।”

“मेरे लिए?”

“हां।”

“इतनी अच्छी?”

“तुम्हारी खाला हूं। इतना भी नहीं कर सकती?”

वरदान हंस देता।

कभी सरोज उसे डांटती—

“समय पर खाना खाया करो।”

“खाता हूं।”

“झूठ मत बोलो।”

“आपको कैसे पता?”

“खाला हूं तुम्हारी। पता चल जाता है।”

धीरे-धीरे वरदान को महसूस हुआ कि सरोज के लिए उसका आना सिर्फ मुलाकात नहीं था।

वह उसके अकेलेपन में एक आवाज था।

एक ऐसा रिश्ता, जिसमें कोई सवाल नहीं था।

कोई सौदा नहीं था।

कोई स्वार्थ नहीं था।

बस अपनापन था।

---

एक दिन वरदान काफी देर से पहुंचा।

सरोज दरवाजे की तरफ बार-बार देख रही थी।

“कहां रह गए थे?”

“काम में फंस गया था।”

“एक फोन नहीं कर सकते थे?”

“मोबाइल की बैटरी खत्म हो गई थी।”

सरोज ने गुस्से से कहा—

“तुम्हें मालूम है मैं कितनी देर से इंतजार कर रही हूं?”

वरदान मुस्करा दिया।

“खाला नाराज हैं?”

“बहुत।”

“मनाऊं?”

“नहीं।”

“चाय पिलाऊं?”

“नहीं।”

“समोसा?”

“दो।”

दोनों हंस पड़े।

वरदान ने उस दिन पहली बार महसूस किया कि सरोज की हंसी कितनी खूबसूरत है।

उसे लगा जैसे इस औरत ने जिंदगी से जितना दर्द पाया था, उससे कहीं ज्यादा प्यार देने की क्षमता अपने भीतर बचाकर रखी थी।

---

कुछ महीनों बाद वरदान को दिल्ली में नौकरी मिल गई।

वह बेहद खुश था।

सबसे पहले उसने सरोज को फोन किया।

“खाला!”

“क्या हुआ?”

“नौकरी लग गई!”

कुछ पल के लिए सरोज चुप रही।

फिर उसकी आवाज कांप गई।

“सच?”

“हां।”

“मैंने कहा था न, तुम कर लोगे।”

“आपने आशीर्वाद दिया था।”

“तो मेहनत तुमने की।”

वरदान ने कहा—

“पहली तनख्वाह से आपके लिए कुछ लाऊंगा।”

“मेरे लिए कुछ मत लाना।”

“क्यों?”

“बस अपने लिए कुछ अच्छा खरीद लेना।”

“नहीं। आपके लिए जरूर लाऊंगा।”

“जिद्दी हो।”

“आपका बेटा हूं।”

फोन के उस पार सरोज की सांस जैसे कुछ पल के लिए रुक गई।

“फिर से बोलो।”

“क्या?”

“जो अभी कहा।”

वरदान मुस्कराया।

“आपका बेटा हूं।”

सरोज की आंखों से आंसू बह निकले।

वह वर्षों से इस शब्द की भूखी थी।

बेटा।

उसके पास अपना परिवार था, भाई था, बहन थी, लेकिन जिंदगी की लंबी दौड़ में वह उनसे भी कहीं दूर हो चुकी थी।

आज किसी ने उसे फिर से मां जैसा अधिकार दिया था।

---

समय बीतता गया।

वरदान की जिंदगी आगे बढ़ती रही।

सरोज की जिंदगी वहीं थी, लेकिन अब उसका इंतजार बदल गया था।

उसे पता था कि किसी न किसी दिन वरदान आएगा।

दरवाजा खुलेगा।

और आवाज आएगी—

“खाला!”

उस एक आवाज के लिए सरोज अपनी पूरी दुनिया समेटकर बैठी रहती।

एक दिन वरदान ने उससे पूछा—

“खाला, अगर आपको दोबारा जिंदगी जीने का मौका मिले तो क्या आप कुछ बदलना चाहेंगी?”

सरोज ने काफी देर तक सोचा।

फिर बोली—

“नहीं।”

वरदान हैरान हुआ।

“कुछ भी नहीं?”

“दर्द को मिटा दूंगी तो उससे निकली ताकत भी मिट जाएगी।”

“तो आपको अपने साथ हुई ज्यादतियों का दुख नहीं?”

“दुख है।”

“फिर?”

“लेकिन मैं अपनी कहानी का अंत दुख में नहीं करना चाहती।”

सरोज ने वरदान की तरफ देखा।

“मैं चाहती हूं कि लोग मेरी कहानी सुनकर यह समझें कि किसी औरत की मजबूरी को उसकी पहचान मत बना देना।”

वह कुछ पल रुकी।

“जिसे तुम कमजोर समझते हो, हो सकता है वह तुमसे कहीं ज्यादा मजबूत होकर जी रही हो।”

वरदान ने सिर झुका लिया।

सरोज ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

“और एक बात याद रखना।”

“क्या?”

“किसी इंसान को उसके हालात से मत पहचानना। उसके दिल से पहचानना।”

वरदान ने मुस्कराकर कहा—

“इसलिए तो आपको खाला मानता हूं।”

सरोज की आंखें फिर भर आईं।

लेकिन इस बार वे आंसू दुख के नहीं थे।

वे उन रिश्तों के थे जिन्हें खून की जरूरत नहीं होती।

---

कई साल बाद जब वरदान अपने परिवार के साथ दिल्ली आया तो उसने सबसे पहले बच्चों से कहा—

“चलो, तुम्हें अपनी खाला से मिलवाता हूं।”

बच्चों ने पूछा—

“कौन-सी खाला?”

वरदान ने मुस्कराकर कहा—

“जिसने मुझे उस समय संभाला था, जब मैं इस शहर में बिल्कुल अकेला था।”

वे सरोज के पास पहुंचे।

सरोज ने बच्चों को देखा और मुस्कराकर पूछा—

“ये कौन हैं?”

वरदान ने कहा—

“आपके भांजे-भांजियां।”

सरोज कुछ बोल नहीं पाई।

उसने बच्चों को गले से लगा लिया।

उसकी आंखें बंद थीं।

शायद वह उन सारे वर्षों को महसूस कर रही थी, जब उसके पास रिश्ते तो थे, लेकिन उन्हें जीने का अवसर नहीं था।

वरदान ने धीरे से कहा—

“खाला...”

सरोज ने उसकी तरफ देखा।

“हां बेटा?”

“तुमसे भी मिलने नहीं आ सकता क्या?”

सरोज मुस्करा दी।

“अब तो तुम्हें मुझसे मिलने के लिए किसी से पूछने की जरूरत ही नहीं।”

उसने वरदान का हाथ पकड़ लिया।

“रिश्ते इजाजत से नहीं, एहसास से बनते हैं।”

वरदान ने उसकी आंखों में देखा।

उसने समझ लिया था कि कुछ रिश्ते जन्म से नहीं मिलते।

वे रास्तों में मिलते हैं।

कभी किसी अनजान गली में।

कभी किसी ढाबे के कोने में।

कभी किसी अजनबी की चिंता में।

और कभी एक मासूम से शब्द में—

“खाला।”

सरोज ने जिंदगी में बहुत कुछ खोया था।

उसका बचपन।

उसका भरोसा।

उसके कई सपने।

लेकिन जिंदगी ने उससे सब कुछ नहीं छीना था।

उसके भीतर ममता बची रही थी।

संघर्ष बचा रहा था।

आत्मसम्मान बचा रहा था।

और सबसे बड़ी बात—

इंसानियत बची रही थी।

शायद इसी वजह से वरदान को उस अंधेरी गली में भी एक रिश्ता दिखाई दिया था।

और सरोज को उसी अंधेरी दुनिया में अपने हिस्से की एक छोटी-सी रोशनी मिल गई थी।

क्योंकि कभी-कभी जिंदगी हमें रिश्ते नहीं देती...

वह हमें अजनबियों के बीच अपना कोई दे देती है।

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