जम्मू-कश्मीर में हुए हालिया आतंकी हमले ने फिर से कई मासूमों की ज़िंदगियाँ छीन लीं। मातम पसरा हुआ था, चिताएं ठंडी भी नहीं हुई थीं, कि शहरों में कैंडल मार्च शुरू हो गए। जगह-जगह लोग सड़कों पर निकले, मोमबत्तियाँ जलाई गईं, नारों की गूंज सुनाई दी। लेकिन उस गूंज के पीछे जो चेहरों की मुस्कान थी, कैमरों की ओर पोज़ देने की होड़ थी, उसने पूरे शोक को एक मज़ाक में बदल दिया।
संवेदना अब भावनाओं से नहीं, इवेंट मैनेजमेंट से जुड़ गई है। फोटो कौन लेगा, सबसे आगे कौन चलेगा, किसके हाथ में मोमबत्ती सबसे साफ़ दिखेगी—ये सब तय होता है। कहीं कोई आंख नम नहीं होती, दिल भारी नहीं होता, सिर्फ होठों पर बनावटी उदासी और आँखों में कैमरे की चमक होती है।
मोमबत्ती जलाना अब विरोध का साधन नहीं, एक ट्रेंड बन चुका है। न सोशल मीडिया पर पोस्ट करने से किसी शहीद को न्याय मिलेगा, न चार नारे लगाने से किसी परिवार का दुख कम होगा। लेकिन फिर भी ये सब होता है, क्योंकि इसमें मेहनत नहीं लगती। बनी-बनाई मोमबत्ती खरीदी, जलाई और एक फोटो के साथ पूरा कार्यक्रम संपन्न।
अगर सच में किसी को श्रद्धांजलि देनी होती, तो शायद किसी शहीद के परिवार तक मदद पहुँचाई जाती। लेकिन वह रास्ता कठिन है। उस रास्ते में श्रम है, समर्पण है और सबसे बड़ी बात—सच्ची संवेदना चाहिए। पर अब इंसान के पास भावनाओं के लिए जगह नहीं रही, केवल दिखावे के लिए समय है।
शोक अब एक सांस्कृतिक रस्म नहीं, बल्कि एक सोशल मीडिया इवेंट है। जहां हैशटैग से संवेदना जताई जाती है, और रील्स में मौन रखा जाता है। जहाँ दर्द नहीं, बस दृश्य होता है। पहले लोग किसी की मौत पर हफ्तों तक कुछ बोल नहीं पाते थे, आज लोग मौके की तलाश में रहते हैं कि कब कुछ बड़ा हो ताकि एक नई पोस्ट बन सके।
असली शोक में शब्द नहीं होते, चेहरों पर चुप्पी होती है। लेकिन आज शोक के नाम पर चीख-चीख कर बताया जा रहा है कि देखो, हम भी दुखी हैं। दरअसल दुखी नहीं, सिर्फ सजग हैं कि कहीं पीछे न रह जाएं। भीड़ में शामिल होकर, मोमबत्ती लेकर, नारा लगाकर हम यह साबित करना चाहते हैं कि हम भी इंसान हैं—लेकिन भीतर कहीं कोई हलचल नहीं होती।
मोमबत्ती की लौ में जो उजाला दिखता है, वो सिर्फ बाहर है। भीतर कुछ नहीं जल रहा। संवेदना अब एक औपचारिकता है, जिसकी समाप्ति फोटो खिंचवाने के साथ हो जाती है। उस क्षण के बाद फिर वही दिनचर्या, वही व्यस्तता, वही बेरुखी।
संवेदनहीनता का यह दौर हमें रोज़ नए रूपों में दिखाई देता है। कभी दुर्घटना में मरे व्यक्ति की लाश के सामने सेल्फी लेते लोग, कभी बीमार को तड़पता देख वीडियो बनाने वाले—और अब शहीदों के लिए निकाले गए मार्च में हँसते हुए लोग। यह वह समाज है जो रोना भी सीख चुका है, दिखावे के लिए।
शोक अगर सच्चा हो तो वह मौन माँगता है, कर्म माँगता है, जिम्मेदारी माँगता है। लेकिन आज के समाज के पास इन सबके लिए समय नहीं। वह केवल उस क्षणिक चमक को पकड़ना चाहता है, जिसमें वह खुद को संवेदनशील साबित कर सके।
मानव अब संवेदना का अभिनय करता है। वह भीतर से रिक्त है, बाहर से व्यस्त। उसकी संवेदनाएँ खत्म नहीं हुईं, बस बेच दी गई हैं—कुछ लाइक्स, कुछ व्यूज़ और थोड़ी वाहवाही के बदले।
मोमबत्ती जलाना सरल है। विरोध में साहस हो तो मशाल भभकनी चाहिए थी। शोकसंवेदना की फेरी के लिए जलाते तो दीप जलाते। लेकिन तेल की शीशी, रूई की बाती और माटी का दिया… इत्ता तामझाम सम्भाल कौन पाता? फिर दीया जलाने में भी हाथ तेल के हो जाते!
इधर तो पट्ट से बनी-बनाई मोमबत्ती ख़रीदी और चट्ट से जला दी। निकाल दिया चार नारों के साथ जुलूस और हो गया कोरम पूरा…विचार कीजिये क्या हम सही रास्ते पर है?
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